बदलते परिवेश और विश्व में भारत का स्थान !

बदलते परिवेश और विश्व में भारत का स्थान !

लेखक, ऋषि पाल गुप्ता (पुडुचेरी)

ऐसा अक्सर बोला जाता है एक ज़माने में भारत एक सोने की चिड़िया हुआ करता था, आज नही है! ठीक उसके बाद ये भी बोला जाता है की भारतीय समस्याएं अति जटिल हैं, अर्थात इनका निदान संभव ही नहीं है! पिछली पीढ़ियों को ये अच्छी तरह घोट के पिलाया गया है विश्व में हमारा स्थान कहीं नहीं है, कुछ इस प्रकार के गाने भी लिखे गये ‘हम उस देश के वासी हैं …….ज्यादा की ज़रुरत नहीं हमको, थोड़े में गुज़ारा होता है! ये है हमारे वर्तमान के साथ खिलवाड़! सोने की चिड़िया और थोड़े में गुजारा! ये दोनों बातें एक दुसरे से भिन्न हैं, यदि आपसे कहा जाए की जहाज को उत्तर दिशा में ले चलो, और साथ में ये भी कहा जाए की, ये जहाज दक्षिण दिशा में जाने के लिए बना है, आप अंदाजा लगा सकते हैं जहाज कहाँ जा पायेगा! आधुनिक भारत, धर्म निरपेक्ष भारत, शालीन भारत, शांतिप्रिय भारत, पंचशील में विश्वास रखने वाला भारत, छत्रपति शिवाजी की धरती कैसे हो सकती है, चन्द्रगुप, समुन्द्र गुप्त, हर्शवर्धन की धरती कैसे हो सकती है! एक ऐसा प्रयास किया गया की एक असहाय पीढ़ी पैदा हो! पर ऐसा प्रयास का जिम्मा सौंपा गया उन लोगों को जिन्हें स्वयं भारत की महानता पर संदेह था !

एक ऐसा वर्ग तैयार किया गया जिनको जीवन की सुविधाएं आसानी से प्राप्त हुई, और योजना आयोग के अध्यक्ष एक ए. सी. कक्ष में बैठ, एक करोड़ का किचन बनवाकर इस बात की गणना करने लगे की भारत में कितने गरीब हैं, और एक गरीब को एक दिन व्यतीत करने के लिए कितने पैसे की आव्यशकता होगी, कुछ बुद्धिजीवी बोले की दो चाय भर का पैसा जो भी व्यक्ति खर्च कर सके वो गरीब नहीं है! बुध्हिजीवियों का एक जमावड़ा तैयार किया गया और अर्थ शाश्रियों का जमावड़ा पहले से ही तैयार था, जो पहले मुगलों की गुलामी में लीन था, फिर अंग्रेजों की नौकरी की, और फिर नये राजा, अर्थात सरकार की गुलामी में लीन हो गया, पूरी तत्परता के साथ, और धीरे धीरे कांग्रेस के समाज सेवी आचरण के नेता कम होते गये, हालांकि ऐसे लोग आज भी काफी हैं, कांग्रेस में भी! कालांतर में कुछ ऐसे परिवर्तन भी आये जिनमे प्रयास किया गया की भारत आगे की दिशा में जाए, हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, रजवाड़ों की पेंशन बंद, इसके अलावा भी कुछ ऐसे कदम उठाये गये जिनके कारण भारत को मजबूती मिली! इसी बीच चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध ने ये भी बता दिया की शांतिप्रिय राष्ट्र को भी फौज की ज़रुरत है! ताली एक हाँथ से भी बज सकती है.

हमारे सामने हमने तिब्बत का अतिक्रमण देखा! ये सब कुछ हुआ, और सारा विश्व देखता रहा, हमने ये भी देखा! यह संवाद विश्व के सन्दर्भ में नहीं है, ये केवल भारत के सन्दर्भ में लिखा गया है, परन्तु हम अपनी प्रगति विश्व के सन्दर्भ में ही देखना पसंद करते हैं! ‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा?’ के तरह का आकलन करने से कोई फायदा भी नही! १९९० के दशक से पहले, जिसे हम नरसिम्हा राव का युग कह सकते हैं, भारत को उस परिवर्तन का सामना करना पड़ा जिसे यूरोप में सदियों पहले ही देखा जा चुका था, अर्थात उदारीकरन! मोटे तौर पर एडम स्मिथ के विचारों के अनुरूप अर्थव्यवस्था को चलाना | स्मिथ को मुक्त अर्थव्यवस्था का जनक माना जाता है, स्मिथ का अद्रश्य हाथ का विचार इसका आधार है! यदि किसी वर्ष आलू की फसल कम हो तो आलू की कीमत अपने आप बढ़ जायेगी जिससे लोग कम खरीदेंगे, और मांग और पूर्ति अपने आप पूरी हो जायेंगी, परन्तु इसके विपरीत यदि आलू की बम्पर पैदावार हो तो कीमतें घट जायेंगी और मांग बढ़ जायेंगी, पुनः मांग और आपूर्ति एक दुसरे को संभाल लेंगे, ऐसा लगता है की जैसे एक अद्रश्य हाथ इनको संभाल रहा है अन्यथा सरकार को इसमें हस्तछेप नहीं करना चाहिए! इस नीयम का ज़िक्र हमने इसलिए किया कि आज हमारा एक वर्ग ये मानता है कि हम गरीब हैं और सरकार को इसे ठीक करना चाहिए, इसके लिए सरकार जिम्मेदार है! सरकार गरीबी का कारण अवश्य हो सकती है परन्तु सरकार कभी गरीबी का निदान नहीं कर सकती! खैर, नरसिम्हा राव का समय एक युग पर्तिवर्तन का समय था,रोज़गार, टीवी, केबल टीवी, इन्टरनेट, मोबाइल फ़ोन, बड़ी-बड़ी कंपनियां, बहुत कुछ जो आम जनता ने पहले कभी नहीं प्रयोग किया था, उनके जीवन में आने लगा! वाजपेयी जी का काल भी कुछ ऐसा ही रहा, प्रगति और तेज़ हुई, बैंकिंग संस्थान दुरुस्त हुए, लोग किराए के मकान से अपने मकानों में गये और एक ऐसा वर्ग भी तैयार होने लगा जो स्वावलंबी था, ऐसा नहीं है की पहले का समाज आलम्बी था, परन्तु ये परिवर्तन अब आर्थिक रूप में भी प्रकट हो रहा था! इस युग में अगर कोई शिकायत रही तो शायद ये की किसान एक फैक्ट्री का मज़दूर बन गया! उसके बाद, दुर्भाग्यवश वाजपेयी जी चुनाव हार गये, और मनमोहन सिंह का दौर आया! काला धन, भृष्टाचार, बैंकिंग संस्थानों के साथ खिलवाड़, हालाँकि पहले पांच सालों में इसका ख़ास पता नहीं चला,
इसका कारण शायद वाजपेयी की सरकार द्वारा किया गया कार्य रहा होगा! मनमोहन सिंह दुबारा चुनाव जीते और अपनी कार्यशैली से सबको चकित कर दिया, एक समय तो ऐसा आया की हिन्दू बहुसंख्यक शरणार्थी की भाँती महसूस करने लगे, और मनमोहन सिंह का ये मानना था की प्राकर्तिक संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला अधिकार है, आज भी लोगों को भयभीत कर देता है! इतिहास भूलता नहीं, और कांग्रेस के वो दिन आये की आज ऐसा लगता है की अंत दूर नहीं, कांग्रेस का! मनमोहन सिंह ने वो जमीन तैयार की की कोई मोदी जैसा प्रधानमंत्री बने! यदि मनमोहन सिंह का युग सही होता तो शायद मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बनते!

मोदीराज, अर्थात मोदी का युग एक ऐसा युग बना जिसमे पुराने संस्थान बिखरने लगे, भारत में कुछ ऐसे परिवर्तन आने लगे की साम्प्रदायिक दंगे बंद हो गये, हालांकि साम्प्रदायिक सद्भाव दूर की बात रही! पर हमेशा बहुसंख्यक हिन्दुओं को ही इसकी जिम्मेदारी सौंपी जाती रही! किसी ने अल्पसंख्यक समुदायों से इसकी जिम्मेदारी लेने को नहीं कहा! परन्तु इसका अर्थ ये नहीं है की अल्पसंख्यक समुदायों ने कोई जिम्मेदारी नहीं निभायी, लोगों ने अपने स्तर पर जो बन पड़ा, किया और कर रहे है, सभी समुदायों में! आज भारत एक नये दौर के मुहाने पर खड़ा है कि भविष्य सामने है, प्रकाश भरा या अन्धकार भरा, ये आज की पीढ़ी को तय करना है! ये पीढ़ी गरीबी के पेट से ना आकर, आशा की गोद से आने वाली पीढ़ी है, दुनिया को चुनौती देने वाली पीढ़ी है, निर्णय करने वाली पीढ़ी है, इस पीढ़ी में वो सब कुछ है जो एक सनहरे भविष्य के लिए चाहिए! आज ये पीढ़ी निश्चित करेगी की कल का भारत कैसा हो, मोदी जी को एक बात का श्रेय अवश्य देना होगा, कि इस पीढ़ी को समझने और समझाने में उनका कोई सानी नहीं! वो एक ऐसे भारत के नेता है, जो कुछ कर गुजरने के लिए तैयार है! प्रश्न बस ये है कि ‘क्या?’.

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