कल कुछ अच्छा होगा, अरुण कुमार सिंह, लेखक

कल कुछ अच्छा होगा, अरुण कुमार सिंह, लेखक

Tomorrow something good will happen

इसकी शुरुआत शायद तब हुई जब गुड्डन चाचा के साथ पहली मर्तबा कुछ गलत हुआ था. उस वक़्त गुड्डन चाचा सिर्फ गुड्डन थे. गलती उनकी थी या किसी और की ये तो मालूम नहीं, पर हाँ सजा उन्ही को मिली. लोग बताते हैं और उन्होंने खुद भी confirm किया था कि उसी दिन पहली बार उनके मुँह से निकला था- ‘चलो, कल कुछ अच्छा होगा!’

और उनके मुँह से निकली ये बात उनकी ज़िन्दगी का फलसफा बन गई. गुड्डन चाचा जब भी दिखते मुस्कुराते दिखते. मैंने जब भी उनको देखा हमेशा लोगों को हंसाते हुए और खुद खिलखिलाते हुए पाया. वो हमेशा बेफिक्रे से रहते. मोहल्ले के लोग बताते हैं कि जब हाई स्कूल में फेल हुए तो उनके पिता ने उनको खूब मारा और गुड्डन चाचा घर के चबूतरे पर बैठे खूब रोये. फिर जाने क्या हुआ और आसूँ पोछकर एकदम से हँसते हुए बोले- “चलो, कल कुछ अच्छा होगा!” अब जाने उनके इस फलसफे का फायदा था या पपेरों में नक़ल मिली थी पर जो भी हो..गुड्डन चाचा के साथ अगले साल हुआ अच्छा ही और वो पास हो गए.

अब तो हर छोटी मोटी गड़बड़ परेशानी पर यही कहते- “चलो, कल कुछ अच्छा होगा!” लोग भी खूब मजे लेते. कहते“कहो गुड्डन, आज कुछ अच्छा हुआ?” तो गुड्डन चाचा मुस्काकर कहते. “अरे हुआ न! तुमने हाल चाल पूछे! इतनी परवाह भला कौन करता है आज के ज़माने में. आज भी अच्छा हुआ है. कल भी कुछ अच्छा होगा!” और फिर हँसने लगते. कुछ तो बात थी उनके हँसने में कि सामने वाला भी उनके साथ हँसने लगता. भले कुछ दूर जाकर उन्हें पागल कहता. वो अलग बात थी.

हाई स्कूल पास किया ही था कि उनकी माँ चल बसीं. गुड्डन चाचा तब भी खूब रोये और क्रिया कर्म के बाद फिर वो सबको धाडस बंधाते हुए कहते- “चलो, कलकुछ अच्छा होगा!”. इस बात पर कुछ एक समझदार लोगों ने उन्हें फिर उल्हाने दिए कि देखो माँ को गुज़रे दो दिन नहीं हुए और ये मुस्कुरा रहे हैं. पर ये सब बातें उनके कानों से काफी दूर थीं. क्यूंकि सामने तो सब यही कह रहे थे- “देखो, कितना समझदार है गुड्डन!”

बारहवी में फिर फेल और फिर उनके बाप की मार. इस बार इतनी मार की हाथ का बलिदान और वो टूट गया. प्लास्टर लगाये दिन भर फिरते और कहते रहते- “चलो, कल कुछ अच्छा होगा!”. इस बार ये कल आने में २ साल लग गए.

लोग कहते हैं बारहवी से निकलते ही नौकरी की तलाश में निकले थे अपने गुड्डन चाचा पर कहींदाल गल नहीं पायी. तो किसी के सलाह मशवरे पर ग्रेजुएशन कर ली… 39% पाकर. अब ये बात किसी को नहीं पता कि 39% की सलाह भी किसी ने गुड्डन चाचा को दी थी या ये उनका निजी फैसला था. जब डिग्री लेकर घर लौटे तो उनके बाप ने उन्हें बहुत सुनाया. इस बार कुछ सोचकर मारा नहीं बस. तो इस पर शाम को चाय की टपरी पर अपनी टोली से कहते रहे- “देखा, मैं न कहता था कि कल कुछ अच्छा होगा! अबकी बिना एक भी बार फ़ैल हुए पास भी हो गए. और थोड़े कम नंबर आ भी गए तब भी अब्बा ने कुछ नहीं मारा. अब कल जरुर इससे भीअच्छा होगा!”

मैंने बचपन से ढेरों किस्से सुन रखे हैं गुड्डन चाचा के. पापा ने बता कर रखा था कि गुड्डन चाचा नगर पालिका में हैं. क्या काम है, किस औहदे पर ये नहीं मालूम, पर हाँ हर आदमी काम करवा देते हैं. न हो पाए तो फिर उनका सन्देश तो है ही दुनिया के लिए- “चलो, कल कुछ अच्छा होगा!”. एक बार मैं खेलकर लौटा तो मम्मी को गुप्ता आंटी से कहते सुना कि गुड्डन चाचा की बीवी तो बहुत पहले ही चल बसीं. बताते हैं कि इलाज़ में पैसे की कमी आ गयी. जो लोग हर वक़्त उनसे काम निकलवाते रहते थेउन सबके उन्हीं दिनों ख़राब दिन चल रहे थे, तो वो गुड्डन चाचा की किसी भी तरह मदद नहीं कर पाए. पर हाँ सबने दिलासा जरुर दिया. बीवी के देहांत के बाद भी गुड्डन चाचा सबसे वैसे ही हसमुख रहे और कहते रहे- “चलो, कल कुछ अच्छा होगा!”. हाँ पर गुड्डन चाचा उसके बाद थोड़ा बूढ़े जरुर हो गए.

एक बार मैं पड़ोस के क्रिकेट ग्राउंड से लड़ झगड़कर लौट रहा था रोते हुए. तोरास्ते में गुड्डन चाचा मिल गए. ज्यादा याद नहीं पर हाँ मुझे रोते देख एक दम से घुटनों के बल बैठकर मुझे गले लगा लिया था. और कहा था, “अरेक्या मियां, दोस्तों से जरा सी बहस पर ऐसे रोओगे! फिकर न करो, कल जरुर कुछ अच्छा होगा! जलेबी खाओगे?” वोपहली मर्तबा था जब मैंने साक्षात् उनके मुँह से वो फलसफा सुना था. कुछ भी कहो उनकी हसमुख आवाज़ के साथ उस फलसफे ने सारी परेशानीभुला दी. थोडायोगदान जलेबी को भी जाता है.

और अगले दिन अच्छा हुआ भी. दोस्तों से फिर दोस्ती हो गयी. और मैं रहा मैन ऑफ़द मैचतो दोस्तों ने खिलाई मिठायी. लौटते वक़्त मुझे फिर गुड्डन चाचा मिले तो मैं सीधे उनके गले लग गया और कहा- “गुड्डन चाचा, आज अच्छा हुआ!” और हँसते हुए उन्हें पूरी बात बताई. वो इस पर खूब हँसे और इस बार इस ख़ुशी में मुझे और जलेबी खिलायीं. औरचलते हुए फिर फलसफा याद करवाया- “कल कुछ अच्छा होगा!”

तबसे मुझे भी इस फलसफे पर यकीन होने लगा. जब जब याद आता तो ये फलसफा काफी धाडस बंधाता था. बाकि उनका और मेरा मिलना होता ही रहता था. और साथ में जलेबी से ताल्लुकात भी बढ़ते रहे. मैं बारहवी में था तो एक सुबह उनके घर की छत गिर पड़ी. बरसों से मरम्मत नहीं हुई थी, लड़कोंकी टोली के साथ मैं भी उनके घर पहुंचा तो देखा तो वो मलबे के ऊपर बैठे सबको कोई चुटकुला सुना रहे थे और कह रहे थे- “चलो, अब खुली हवा में सोने का आनंद मिलेगा. और वैसे भी कल कुछ अच्छाही होगा!”. उसके बाद कभी वो छत दोबारा नहीं बनी. और उनकी जिंदगी साइड के बने छोटे से कमरे में गुजरने लगी.

मैं ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली चला आया. छुट्टियों में लौटा तो फिर उनसे मिला. उन्होंने हाल चाल पूछे. पढाई लिखाई कैसे, दिल किसी से लगा की नहीं. इस तरीके के कुछ सवाल और हमारी जलेबियाँ. मैंने उन्हें बताया जो भी दिक्कतें थीं. जानता था कि जवाब यही आएगा कि फिकर न कर कल कुछ अच्छा होगा. पर उनके मुँह से सुनने का सुकून जाने नहीं देना चाहता था.

मैं वापस चला आया छुट्टियों के बाद. अब ये जाने उनके कहे का असर था या जाने मेरी मेहनत और विश्वास कि चीजें ठीक होने लगीं. मेरीपढाई भी सही ट्रैक पर आ गयी और दिल के मामले में कश्ती थोड़ी आगे बढ़ गयी. ख्याल आया कि गुड्डन चाचा को बता दूं कि वो अच्छा वाला कल आ गया है. दिवाली पर घर पंहुचा तो सीधे गुड्डन चाचा से मिलने उनके घर चला गया. देखा तो उनका एक कमरे का घर नहीं था. उसकी जगह नया ढांचा बन रहा था सरियों का. मैं दौड़ते हुए घर आया और मम्मी से पूछने लगा- “वो गुड्डन चाचा के घर को क्या हुआ?”

“वो…अरे वो तो चल बसे.” मैंसुनते ही सन्न रह गया. “कैंसर था बेचारे को. दवाई के पैसे भी नहीं थे. किसी को पता भी नहीं था. बस एक दो करीब वालों को पता था और गुड्डन भाई ने बाकी के लोगों को बताने से मना किया था. तो वही एक रात खून की उल्टियाँ करते करते चल बसे…बोल भी नहीं पाए कुछ. अगले दिन दोपहर तक जब कमरे से बाहर नहीं निकले…”

मैं मम्मी की बात सुनते सुनते फ़र्स पर बैठ गया.

“…अच्छे आदमी थे. हर वक़्त हँसते रहते थे. अरे उनकी श्रधांजलि देने के लिए फोटो भी निकली है अख़बार में…सब पिंकू ने करवाया है.” मम्मी बताती रहीं. मैंवहीँ बैठे उनकी बात सुनता रहा. फिर उनसे अख़बार माँगा. अख़बार लेकर मैं अपने कमरे में चला गया और काफी देर उनकी तस्वीर को देखता रहा. फोटो उनके मरने के बाद की थी. पर चहरे परवही मुस्कराहट. मानों कह रहे हों… “फिकर मत करो, कल कुछ अच्छा होगा!”

उसी दिवाली मैं एक शाम बाहर निकला तो देखा एक लड़का रोता हुआ आ रहा है कहीं से. देखा तो सोनू था पड़ोस का. मैंने रोककर पूछा कि क्या हुआ तो बोला दोस्तों से लडाई हो गयी.सब उसे ही परेशान करते हैं. मुझे एकदम से गुड्डन चाचा की याद आ गयी. मैं वहीँ घुटनों के बल बैठ गया और उसको गले लगा लिया और उससे कहा- “कोई बात नहीं! फिकर मत करो, कल कुछ अच्छा होगा!”

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